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मेरा अनोखा शिष्य तथा गुरु – “छोटू”

संगीताचार्य एस्‌. सी. आर. भट

श्री. कृष्णा गिण्डे – ‘छोटू’- मेरा न केवल शिष्य ही हैं, गुरु और प्रेरणा स्त्रोत भी हैं। यह बात कुछ अटपटी लग सकती है किन्तु यह सत्य अवश्य हैं और आंतरिक अनुभूति से उद्भूत है। लखनऊ में मैंने ‘छोटू’ को शिक्षा दी हैं अत: वह मेरा शिष्य है और इस प्रतिभावान बालक ने उस समय जैसी साधना की तथा गुरुवर्य श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकरजी के निकट सान्निध्य में रहकर निष्ठा एवम्‌ भक्तिभाव से जैसा विद्याधन ‘प्राप्त’ कर गौरवमय भण्डार पूरित किया, उस नाते वह मेरा गुरु हैं और प्रेरणा स्त्रोत भी। ‘छोटू’ की स्मरणशक्ति अद्भुत है, वह एक उच्चकोटि का गायक ही नहीं बल्कि नायक भी हैं। वास्तव में यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं कि छोटू को आज जितनी बंदिशें याद हैं, शायद ही किसी गायक को याद हो। गुरुवर्य रातंजनकरजी-अण्णा साहब- की चिन्तनधारा के अनुरूप उनकी बंदिशों को स्वर-ताल-बद्ध कर प्रस्तुत करना ‘छोटू’ की सर्जनक्षमता का परिचायक था और इसे स्वयम्‌ गुरुवयें अण्णासाहबने स्वीकार किया था और छोटू को आशीर्वाद भी दिया था, राग-सागर अथवा राग-माला बंदिश की प्रस्तुति इसका एक उत्कृष्ट दृष्टांत हैं। वस्तुत: श्री. गिण्डे ऐसे फूलों का गुलदस्ता हैं, जिसमें विविध रंग और चिरंत सुगरन्ध हैं। यह परम शक्तिमान की असीम अनुकम्पा का फल हैं कि मुझे ऐसा शिष्य और ‘सखा’ मिला।

यह उल्लेखनीय हैं. कि आज मुझे इसलिए भी परम आनन्द की अनुभूति हो रही हैं कि अपने इस अनोखे, प्रतिभावान चरित्रवान, निष्ठावान शिष्य’ की षष्ठीपूर्ति देखने की मेरी आंतरिक अभिलाषा पूर्ण हुईं। संगीत को समर्पित मेरा यह जीवन कई थपेड़ों को झेलता रहा, नादब्रह्म का पुजारी यह मन, सर्वदा यही कामना करता रहा कि मेरे शिष्य-सखा-गुरु की कीर्ति मैं अपने जीवनकाल में देख सकूँ, उस शक्तिमान का परम आशीर्वाद ‘हम दोनों’ को हमारे गुरुवर्य के माध्यम से मिला हैं उसका पल्‍लवित-पुष्पित रूप मैं देख सकूँ। उस चिरंतन शक्ति से प्राप्त मनोबल ने मुझे शक्ति दी और उसी की ज्योति से यह गौरवमण्डित आयोजन देखकर आंतरिक आनन्द हुआ, मैं कृतकृत्य हो गया ।

हमारे छोटू’ के बड़े भाई तथा उसके प्रथम गुरु, प्रख्यात ‘न्यूरो-सर्जन’ स्व. डॉ. राम गिण्डे भी अण्णासाहेब का रियाज़ सुनने रोज आया करते थे। १९३६ का मई महिना होगा, जब कि पूज्य अण्णासाहेब गर्मी की छट्टियों में बम्बई आये थे । तीन महिनों की इन छुट्टियों में गुरुजी रोज शाम को रियाज़ के लिये बैठते थे और श्रोताओं का वही जमाव रहता था। मेरे लखनऊ जाने के पूर्व यानि सितम्बर-अक्तूबर १९३५ से में गुरुजी के रियाज़ के समय यथाशक्ति संगत करता था । डॉक्टर गिण्डे साहब मुझे सदा प्रोत्साहित करते रहते थे । इस प्रकार मैं डॉक्टर साहब के काफी निकट आ गया था ।

इसी मई महीने में एक दिन मैंने अण्णासाहब के घर पर एक खूबसूरत, हँसमुख बालक देखा | इस गौरवर्ण प्यारे बालक को देखकर मन में उसे लाड-प्यार करने की इच्छा स्वत: जागृत हो गई। पूज्य अण्णासाहब के छोटे भाई श्री. गजाननरावजी से पूछने पर पता चला कि वह डॉक्टर साहब का छोटा भाई कृष्णा हैं ।

ऊपर मैं गायनाचार्य पं. के. जी. गिण्डे के लिए ‘छोटू’ शब्द का प्रयोग करता आ रहा हूँ, उसे यहाँ स्पष्ट करना समीचीत होगा | पूज्य अण्णासाहब का नाम भी श्रीकृष्ण होने के कारण पुराने रिवाज के अनुसार पूज्य गुरुजी की पत्नी तथा घर के अन्य वयोवुद्ध सदस्य उस नाम का उच्चारण नहीं कर सकती थी, अतः पूज्य गुरुजी ने ही श्री कृष्णा गिण्डे का नामकरण ‘छोटू’ किया । तब से हम सभी श्री. कृष्णा गिण्डे को “छोटू या ‘छोट्बा’ नाम से पुकारने लगे। आयु और शिष्य के नाते अथवा प्रिय होने के कारण ‘छोटू’ कहने का मुझे अधिकार है और इसमें एक प्रकार का नैकट्य और आत्मीयता का भाव भी प्रगट होता हैं। इसी कारण मैंने ‘कृष्णा गुंडोपंत गिण्डे’ को, श्रीवल्लभ संगीतालय के प्राचार्य होते हुए भी ‘छोटू’ नाम से ही यहाँ सम्बोधित किया है। इसमें आदर हैं और परम स्नेह भी हैं। अस्तु ।

जब इस बालक के साथ मैंने उसके माता-पिता को नहीं देखा तो मैंने डॉक्टर साहब से इस बारे में पूछताछ की । डॉक्टर साहब ने बताया कि ‘मैंने इस बालक को पूज्य गुरुजी के साथ लखनऊ भजने का विचार किया हैं। कुछ दिन गुरुजी के साथ अकेला रहेगा तो उनके साथ हिलमिल जायगा। यह सोचकर ही मैं इसे अकेला लाया हूँ ताकि वह हँसी-खुशी गुरुजी के साथ लखनऊ जायेगा | डॉक्टर साहब को शंका तो थी ही कि कहीं घर और माता-पिता की याद कर हठ न कर बेठे क्योंकि केवल १० वर्ष की उसकी उम्र थी। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । मेरा भी उसी समय (१९३६) लखनऊ जाने का निश्चय हो चुका था । लखनऊ जाने के तीन चार दिन पूर्व डॉक्टर साहब ने मुझे अकेले में बुलाकर कहा कि “यह खुशी की बात हैं कि आप भी संगीत सीखने लखनऊ जा रहे हैं। हमारा  कृष्णा भी गुरुजी के साथ लखनऊ जा रहा हैं। मेरा सम्पूर्ण विश्वास हैं कि पूज्य गुरुजी उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, आप भी उसका ध्यान रखना ।” इतना कहते-कहते डॉक्टर साहब की आँखें भर आई-ये स्नेह, ममता और प्रेम के आँसू थे। मैंने कहा कि हम अच्छे काम के लिये जा रहे हैं, परमात्मा हमारे साथ हैं, आप चिन्ता न करें ।

पूज्य गुरुजी और ‘छोटू’ कुछ दिन पहले लखनऊ पहुँच गये थे । मैं कुछ दिनों बाद वहाँ पहुँचा ।

‘छोटू’ बाल्यकाल से ही संगीत के पुनीत संस्कारों से सम्पन्न रहा । उसके पूज्य पिताजी स्वयम्‌ अच्छे डॉक्टर होते हुए भी, परम रामभक्‍त थे और घर पर राम-भजन के कार्यक्रम हुवा करते थे और ऐसे अवसरों पर वे अपने सभी बच्चों को साथ लेकर भजन-कीतन करते थे । ‘छोटू ! सब से छोटा होते हुए भी अच्छा गाता था। इसी कारण घर के लोगों का छोटू को बड़ा प्रोत्साहन मिला । पिताजी अपने बच्चों को उस समय में उपलब्ध ग्रामोफोन रिकार्डों को लाकर सुनवाते थे। ये रिकार्ड सुनंकर ‘छोटू’ पाँच-छ: साल की आयु में ही छोटी महफिलों में गाकर श्रोताओं को आश्चयच्रकित करता था। अत: ‘छोटू’ को संगीत सीखने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुईं। लखनऊ पहुँचते ही पूज्य गुरुजीने ‘छोटू’ की स्कूली शिक्षा की व्यवस्था कर दी और लगभग डेढ़ साल तक घर पर ही उसे संगीत की शिक्षा स्वयम्‌ देते रहें। बाद में छोटू’ को संगीत की द्वितीय कक्षा में प्रवेश दिला दिया। उस समय ‘छोटू’ की दिनचर्या यह थी कि सुबह गुरुजी से संगीत-शिक्षा तथा अभ्यास करना, दिन में स्कूल जाना और शाम को संगीत कक्षा में शिक्षा पाना | इस प्रकार छोटू संगीत के द्वितीय और तृतीय वर्ष की परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुआ ।

मुझे १९३६ में ही तृतीय कक्षा में प्रवेश मिल गया था और उसी वर्ष दिसम्बर में मैं तीसरी कक्षा उत्तीर्ण हो कर चौथी कक्षा में आ गया था। इसी वर्ष कॉलिज में छात्रों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी और शिक्षक कम थे । अत: हमारे गुरुजी ने सोचा कि जो वरिष्ठतम छात्र हैं और जिनमें निचले वर्गों की शिक्षा देने की क्षमता हैं, उन्हें ऐसे एक-एक वर्ग सौंप दिये जाय, तो समस्या हल हो सकती हैं। इस विचार से उन्होंने मुझे प्रथम वर्ष का वर्ग सिखाने को दिया । इस वर्ग में लगभग २० विद्यार्थी थे, जिनमें आज के पाश्वंगायक तलत महमूद भी थे। जिस समय मैं चतुर्थ वर्ष की परीक्षा में बैठा, उसी समय मेरे सिखाये हुए प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों की परीक्षा हुई और उनमें से चार-पाँच विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए, जिनमें तलत महमूद भी थे। इस परीक्षाफल से प्रसन्न होकर गुरुजीने मुझे बालकों का चतुर्थ वर्ष का वरिष्ठ वर्ग सौंप दिया और इसी वर्ग में ‘छोटू’ भी थे । मेरे लिये यह प्रथम अवसर था, साथ साथ बड़ी जिम्मेदारी का काम था। मैंने परिश्रम कर इस चतुर्थ वर्ष का पाठ्यक्रम परीक्षा के दो माह पूर्व ही सम्पूर्ण गायकी के साथ (प्रति राग में लगभग ४-५ बंदिशों समवेत) पूर्ण कर दिया ताकि दोहराने और अभ्यास के लिए पर्याप्त समय मिल सके। एक दिन प्रत्येक विद्यार्थी को सिखाई हुई बंदिशों में से मैं पूछी हुई एक-एक बंदिश गाकर सुनाने को कहा और मैंने देखा कि ‘छोटू’ के समवेत सभी विद्यार्थियों को कोई भी एक बंदिश पूरी याद नहीं है । मैं हैरान हो गया और मुझे निराशा भी हुई। मैं बहुत क्रुद्ध हुआ, सम्भवतः अपने सांगीतिक जीवन में प्रथम बार। मैंने उसी क्रुद्ध अवस्था में सभी छात्रों को चेतांवनी दी कि यदि एक सप्ताह में सभी बंदिशें याद न हुई तो उन्हें प्रधानाचार्य (अर्थात्‌ हमारे गुरुजी) के सन्मुख खड़ा करूँगा और तब तक उन्हें सिखाऊंगा भी नहीं। मेरी इस प्रकार की नाराजगी देखकर ‘छोटू’ की आँखे भर आयीं । इसका ऐसा परिणाम हुआ कि दूसरे सप्ताह ही छोटू’ ने मेरी पूछी हुई प्रत्येक बंदिश को समाधानपूर्वक गाकर सुनाई और परीक्षा में भी उसने बहुत ही ऊँचे गुण प्राप्त किये, जिससे मेरे मन को शांति मिली। छोटू को प्रवृत्ति ‘खिलाड़ी’ की थी और वह मान बैठा था कि जब बिना परिश्रम सब कुछ मिल रहा है, तो मेहतत क्यों की जाय। किन्तु इस घटना ने उसका चिंतन ही बदल दिया, जो कुछ भी सिखाया जाता वह बड़े मनोयोग से सुनता और उसे आत्मसात करता।

इसके कुछ ही समय पश्चात्‌ मुझे गरुगृह में ही रहने का अवसर मिला, जहाँ परमपूज्य गुरुजी के अलावा ‘छोटू’, दिनकर कायकिणी, मोहनराव कल्याणपूरकरजी भी गृरुजी के साथ रहते थे।

वास्तव में गरु-सान्निध्य ही शिक्षा कीं जड़ हैं। गुरुजी हमें प्राय: कहते थे कि तुम लोग अपने कमरे में (जो उनके कमरे से लगा हुआ था) यथावकाश रियाज़ करते रहों और अगर कोई बात मुझे खटकी तो मैं तुम्हें तुरन्त सुधार सकूँ तथा तुम्हारी भूल समझा सकूँ। इस बात को सुनते ही हम लोगों ने बिना किसी विलम्ब के अपना रियाज़ शुरू किया। यह रियाज विद्यालय का समय समाप्त होने के बाद रात को ८-९ बजे शुरू होता था। कोई भी सीखा हुआ एक राग हम ले लेते थे और उसके सम्पूर्ण अंगों के साथ दो-ढ़ाई घण्टे रियाज करते थे । पास के कमरे में बैठे गुरहणीरुजी का हमारे रियाज़ पर पूरा ध्यान रहता था। जब भी गुरुजी अनुभव करते कि अब इनका ‘स्टॉक’ प्राय:समाप्त हो चुका हैतो उनमें स्फूर्ति जागृत होती और स्वयम्‌ हमारे बीच आकर नयी-नयीं कल्पनाओं के साथ हमें ‘प्रकाश’ दिखाते । फलत: हमें नयी दृष्टि मिलती, दिशा मिलती l वस्तुतः: यह दृष्टि ही हम सभी के बौद्धिक विकास में अत्यंत फलदायक रही और रहेगी । यहाँ एक और बात उल्लेखनीय हैं कि शिक्षा दी अवश्य जाती है किन्तु शिक्षा ली जाने! का भी महत्व हैं। पूज्य गुरुजी कई बार अपने कमरे में आराम कुर्सी पर बैठकर दिन भर के कार्यभार को हलका करते हुए कोई राग गुनगुनाते रहते थे। में और ‘छोटू’ चुपचाप उनका यह गुनगनाना सुनते और तुरन्त अपने कमरे में जाकर उस स्वर में तानपुरा मिलाकर तथा एक बाँया साथ लेकर चुपचाप उनके कमरे में जाकर तानपुरा छेड़ना शुरू कर देते। जब उन्हें इसका भान होता तो उन्हें आनन्द होता और आश्चर्य भी । किन्तु शिक्षा देने को उन्हें प्रेरित करने की बात इसमें निहित थी और गुरुजी भी शिष्यों की निष्ठा पर गर्व अनुभव कर प्रेम से सिखाते ।

‘छोटू’ अद्भुत प्रतिभासम्पन्न संगीतज्ञ हैं, जिसे कोई भी बंदिश एक बार सुनते ही याद हो जाती हैं। बंदिशें याद करना और उनके सही स्वस्थ स्वरूप को आत्मसात करना, उनकी प्रवत्ति का एक अंग है। बुजुर्गों का यह कथत सत्य है कि जिन्हें एक राग की अधिकाधिक चीज़ों का ज्ञान हैं, वही प्रतिभाशाली कलाकार होते हैं। आज ‘छोटू’ को जितनी बंदिशें याद हैं, हम लोगों में से शायद ही किसी को याद हों । उनका राग-ज्ञान इतना गहन हैं कि आज वे उच्चस्तर के गायक हैं। यह बात अतिशयोक्त पूर्ण नहीं है। मेरे लिये यह आनन्द की बात है। आज यदि वे स्थायीरूप से उत्तर प्रदेश में बस गये होते तो किसी विद्यापीठ के, यहाँ तक कि अपने ही भातखण्डे संगीत महाविद्यालय या विद्यापीठ में उच्चतम स्थान पर होते ।

‘छोटू’ को पूज्य गुरुजी का बहुत ही निकटतम साज्निध्य प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।, वैसा शायद ही किसी को मिला हो, क्योंकि बाल्यकाल से ही वे उन्हीं के घर लगभग १५-१६ वर्षों तक उनके साथ रहे । घर में चलनेवाली संगीत चर्चाओं का ‘छोटू’ को पूरा लाभ मिला। पूज्य गुरुजीने अपने जीवन काल में लगभग ७००-८०० बंदिशों की रचना की, जो उच्चस्तर की हैं। वे शिर्ष कवि थे, किसीनें उनसे एक आध बंदिश की फरमाइश की और तुरन्त तैयार हो जाती । उसकी प्रथम प्रति छोटू’ को ही मिलती और ‘छोटू्‌’ को ही यह देखना होता था कि वह किस ताल में बिठाने के योग्य हैं। उन बंदिशों की पाण्डुलिपि तैयार करने का भार छोटू’ को ही सौंप दिया जाता । इतना ही नहीं गुरुजी अपनी स्वरचित बंदिशों को छोटू’ के कण्ठ से सुनना-सुनवाना अधिक पसंद करते थे। इस प्रकार छोटू’ को गुरुजी की सभी बंदिशें कण्ठस्थ हुईं। पूज्य गुरुजी के सांगीतिक चिंतन का पूरा ज्ञान ‘छोटू’ के पास समग्ररूप में पहुँचा हैं। ‘छोटू’ जब गाने बैठते हैं तो मुझे ऐसा अनुभव होता हैं कि पूज्य गुरुजीही गा रहे हैं । इसका एक दृष्टांत यहाँ देना उचित होगा । उस्ताद मुष्ताक हुसैन खाँ अपनी महफिलों में प्रायः रागसागर’ गाते थे, जिससे उस समय ‘रागसागर का काफी बोलबाला हुआ था। उसी कालावधी में एक दिन गुरुजी ने रागसागर’ के अनुरूप एक काव्य की रचना की और ‘छोटू’ को देते हुए कहा कि इसकी प्रतियाँ बनाकर उसके साथ शिक्षा पाने वाले अन्य शिष्यों को दे दों और उसके समवेत सभी को आदेश दिया कि उस काव्य का

स्वरकरण चौबीस घण्टों के अन्दर मिल जाना चाहिये। ‘छोटू’ की क्षमता की यह कसौटी थी। खैर, अन्य शिष्योंने तो इस पर किसी प्रकार का प्रयत्न ही नहीं किया। ‘छोटू’ ने केवल ६-७ घण्टों में ही उस रागसागर का स्वरकरण किया तथा गुरुजी को सुनाया। गुरुजीने सुनकर इतना ही कहा कि इस स्वरकरण में ८० प्रतीशत रूपान्तर वही हैं, जो उन्होंने स्वयम्‌ सोचा था। वे बहुत प्रसन्न हुए और मनीमन अपने ‘मानसपुत्र’ को आशीर्वाद दिया। गुरु द्वारा इस प्रकार की मान्यता पाना एक बहुत बड़ी बात हैं। ‘छोटू’ मेरा शिष्य तथा लाड़ला छोटा भाई भी हैं, किन्तु इस प्रतिभा के बल पर मैं उसे अपने गुरुओं में से एक मानता हूँ ।

आज हमें उसी स्वरूप का दर्शन ‘छोटू’ के गायन एवम्‌ शिक्षण में होता हैं। मेरा और ‘छोटू’ का क्‍या नाता हैं, यह में आज भी समझ नहीं पा रहा हूँ, यह एक अदृश्य किन्तु दृढ़ आन्तरिक सृत्र हैं, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता यह अनुभूति की चीज़ है, जिससे मन प्रफुल्लित होता हैं, रोम-रोम पुलकित होता हैं। हमारे सांगीतिक जीवन में ‘छोटू’ से प्राप्त प्रेम और स्नेह अविस्मरणीय हैं। पूज्य गुरुजी की कृपा और अपार स्नेह से हममें जैसी पारस्परिक आबद्धता, एकसूत्रता है, वह अपने आप में एक उदाहरण हैं। यह प्रेम बढ़े, अपूर्ण इच्छाएँ पूर्ण हों ।

‘छोटू’ के बारे में जितना कहूँ, उतना कम हैं। यदि वे शिक्षक के चक्र में नहीं फँसते तो मालूम नहीं कहाँ पहुँचते । मेरी प्रभूचरणों में यही प्रार्थना हैं कि ‘मेरे प्यारे छोटू भाई को’ दीर्घायु, आरोग्य और संगीत की इसी प्रकार उत्कृष्ट सेवा करने की बुद्धि और क्षमता प्रदान करे। उनका जीवन गौरवमण्डित हो, यही मेरी आन्तरिक कामना हैं।

ज़ीवेम शरदः शतम्‌

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