Posted on Leave a comment

मेरा अनोखा शिष्य तथा गुरु – “छोटू”

संगीताचार्य एस्‌. सी. आर. भट

श्री. कृष्णा गिण्डे – ‘छोटू’- मेरा न केवल शिष्य ही हैं, गुरु और प्रेरणा स्त्रोत भी हैं। यह बात कुछ अटपटी लग सकती है किन्तु यह सत्य अवश्य हैं और आंतरिक अनुभूति से उद्भूत है। लखनऊ में मैंने ‘छोटू’ को शिक्षा दी हैं अत: वह मेरा शिष्य है और इस प्रतिभावान बालक ने उस समय जैसी साधना की तथा गुरुवर्य श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकरजी के निकट सान्निध्य में रहकर निष्ठा एवम्‌ भक्तिभाव से जैसा विद्याधन ‘प्राप्त’ कर गौरवमय भण्डार पूरित किया, उस नाते वह मेरा गुरु हैं और प्रेरणा स्त्रोत भी। ‘छोटू’ की स्मरणशक्ति अद्भुत है, वह एक उच्चकोटि का गायक ही नहीं बल्कि नायक भी हैं। वास्तव में यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं कि छोटू को आज जितनी बंदिशें याद हैं, शायद ही किसी गायक को याद हो। गुरुवर्य रातंजनकरजी-अण्णा साहब- की चिन्तनधारा के अनुरूप उनकी बंदिशों को स्वर-ताल-बद्ध कर प्रस्तुत करना ‘छोटू’ की सर्जनक्षमता का परिचायक था और इसे स्वयम्‌ गुरुवयें अण्णासाहबने स्वीकार किया था और छोटू को आशीर्वाद भी दिया था, राग-सागर अथवा राग-माला बंदिश की प्रस्तुति इसका एक उत्कृष्ट दृष्टांत हैं। वस्तुत: श्री. गिण्डे ऐसे फूलों का गुलदस्ता हैं, जिसमें विविध रंग और चिरंत सुगरन्ध हैं। यह परम शक्तिमान की असीम अनुकम्पा का फल हैं कि मुझे ऐसा शिष्य और ‘सखा’ मिला।

यह उल्लेखनीय हैं. कि आज मुझे इसलिए भी परम आनन्द की अनुभूति हो रही हैं कि अपने इस अनोखे, प्रतिभावान चरित्रवान, निष्ठावान शिष्य’ की षष्ठीपूर्ति देखने की मेरी आंतरिक अभिलाषा पूर्ण हुईं। संगीत को समर्पित मेरा यह जीवन कई थपेड़ों को झेलता रहा, नादब्रह्म का पुजारी यह मन, सर्वदा यही कामना करता रहा कि मेरे शिष्य-सखा-गुरु की कीर्ति मैं अपने जीवनकाल में देख सकूँ, उस शक्तिमान का परम आशीर्वाद ‘हम दोनों’ को हमारे गुरुवर्य के माध्यम से मिला हैं उसका पल्‍लवित-पुष्पित रूप मैं देख सकूँ। उस चिरंतन शक्ति से प्राप्त मनोबल ने मुझे शक्ति दी और उसी की ज्योति से यह गौरवमण्डित आयोजन देखकर आंतरिक आनन्द हुआ, मैं कृतकृत्य हो गया ।

हमारे छोटू’ के बड़े भाई तथा उसके प्रथम गुरु, प्रख्यात ‘न्यूरो-सर्जन’ स्व. डॉ. राम गिण्डे भी अण्णासाहेब का रियाज़ सुनने रोज आया करते थे। १९३६ का मई महिना होगा, जब कि पूज्य अण्णासाहेब गर्मी की छट्टियों में बम्बई आये थे । तीन महिनों की इन छुट्टियों में गुरुजी रोज शाम को रियाज़ के लिये बैठते थे और श्रोताओं का वही जमाव रहता था। मेरे लखनऊ जाने के पूर्व यानि सितम्बर-अक्तूबर १९३५ से में गुरुजी के रियाज़ के समय यथाशक्ति संगत करता था । डॉक्टर गिण्डे साहब मुझे सदा प्रोत्साहित करते रहते थे । इस प्रकार मैं डॉक्टर साहब के काफी निकट आ गया था ।

इसी मई महीने में एक दिन मैंने अण्णासाहब के घर पर एक खूबसूरत, हँसमुख बालक देखा | इस गौरवर्ण प्यारे बालक को देखकर मन में उसे लाड-प्यार करने की इच्छा स्वत: जागृत हो गई। पूज्य अण्णासाहब के छोटे भाई श्री. गजाननरावजी से पूछने पर पता चला कि वह डॉक्टर साहब का छोटा भाई कृष्णा हैं ।

ऊपर मैं गायनाचार्य पं. के. जी. गिण्डे के लिए ‘छोटू’ शब्द का प्रयोग करता आ रहा हूँ, उसे यहाँ स्पष्ट करना समीचीत होगा | पूज्य अण्णासाहब का नाम भी श्रीकृष्ण होने के कारण पुराने रिवाज के अनुसार पूज्य गुरुजी की पत्नी तथा घर के अन्य वयोवुद्ध सदस्य उस नाम का उच्चारण नहीं कर सकती थी, अतः पूज्य गुरुजी ने ही श्री कृष्णा गिण्डे का नामकरण ‘छोटू’ किया । तब से हम सभी श्री. कृष्णा गिण्डे को “छोटू या ‘छोट्बा’ नाम से पुकारने लगे। आयु और शिष्य के नाते अथवा प्रिय होने के कारण ‘छोटू’ कहने का मुझे अधिकार है और इसमें एक प्रकार का नैकट्य और आत्मीयता का भाव भी प्रगट होता हैं। इसी कारण मैंने ‘कृष्णा गुंडोपंत गिण्डे’ को, श्रीवल्लभ संगीतालय के प्राचार्य होते हुए भी ‘छोटू’ नाम से ही यहाँ सम्बोधित किया है। इसमें आदर हैं और परम स्नेह भी हैं। अस्तु ।

जब इस बालक के साथ मैंने उसके माता-पिता को नहीं देखा तो मैंने डॉक्टर साहब से इस बारे में पूछताछ की । डॉक्टर साहब ने बताया कि ‘मैंने इस बालक को पूज्य गुरुजी के साथ लखनऊ भजने का विचार किया हैं। कुछ दिन गुरुजी के साथ अकेला रहेगा तो उनके साथ हिलमिल जायगा। यह सोचकर ही मैं इसे अकेला लाया हूँ ताकि वह हँसी-खुशी गुरुजी के साथ लखनऊ जायेगा | डॉक्टर साहब को शंका तो थी ही कि कहीं घर और माता-पिता की याद कर हठ न कर बेठे क्योंकि केवल १० वर्ष की उसकी उम्र थी। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । मेरा भी उसी समय (१९३६) लखनऊ जाने का निश्चय हो चुका था । लखनऊ जाने के तीन चार दिन पूर्व डॉक्टर साहब ने मुझे अकेले में बुलाकर कहा कि “यह खुशी की बात हैं कि आप भी संगीत सीखने लखनऊ जा रहे हैं। हमारा  कृष्णा भी गुरुजी के साथ लखनऊ जा रहा हैं। मेरा सम्पूर्ण विश्वास हैं कि पूज्य गुरुजी उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, आप भी उसका ध्यान रखना ।” इतना कहते-कहते डॉक्टर साहब की आँखें भर आई-ये स्नेह, ममता और प्रेम के आँसू थे। मैंने कहा कि हम अच्छे काम के लिये जा रहे हैं, परमात्मा हमारे साथ हैं, आप चिन्ता न करें ।

पूज्य गुरुजी और ‘छोटू’ कुछ दिन पहले लखनऊ पहुँच गये थे । मैं कुछ दिनों बाद वहाँ पहुँचा ।

‘छोटू’ बाल्यकाल से ही संगीत के पुनीत संस्कारों से सम्पन्न रहा । उसके पूज्य पिताजी स्वयम्‌ अच्छे डॉक्टर होते हुए भी, परम रामभक्‍त थे और घर पर राम-भजन के कार्यक्रम हुवा करते थे और ऐसे अवसरों पर वे अपने सभी बच्चों को साथ लेकर भजन-कीतन करते थे । ‘छोटू ! सब से छोटा होते हुए भी अच्छा गाता था। इसी कारण घर के लोगों का छोटू को बड़ा प्रोत्साहन मिला । पिताजी अपने बच्चों को उस समय में उपलब्ध ग्रामोफोन रिकार्डों को लाकर सुनवाते थे। ये रिकार्ड सुनंकर ‘छोटू’ पाँच-छ: साल की आयु में ही छोटी महफिलों में गाकर श्रोताओं को आश्चयच्रकित करता था। अत: ‘छोटू’ को संगीत सीखने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुईं। लखनऊ पहुँचते ही पूज्य गुरुजीने ‘छोटू’ की स्कूली शिक्षा की व्यवस्था कर दी और लगभग डेढ़ साल तक घर पर ही उसे संगीत की शिक्षा स्वयम्‌ देते रहें। बाद में छोटू’ को संगीत की द्वितीय कक्षा में प्रवेश दिला दिया। उस समय ‘छोटू’ की दिनचर्या यह थी कि सुबह गुरुजी से संगीत-शिक्षा तथा अभ्यास करना, दिन में स्कूल जाना और शाम को संगीत कक्षा में शिक्षा पाना | इस प्रकार छोटू संगीत के द्वितीय और तृतीय वर्ष की परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुआ ।

मुझे १९३६ में ही तृतीय कक्षा में प्रवेश मिल गया था और उसी वर्ष दिसम्बर में मैं तीसरी कक्षा उत्तीर्ण हो कर चौथी कक्षा में आ गया था। इसी वर्ष कॉलिज में छात्रों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी और शिक्षक कम थे । अत: हमारे गुरुजी ने सोचा कि जो वरिष्ठतम छात्र हैं और जिनमें निचले वर्गों की शिक्षा देने की क्षमता हैं, उन्हें ऐसे एक-एक वर्ग सौंप दिये जाय, तो समस्या हल हो सकती हैं। इस विचार से उन्होंने मुझे प्रथम वर्ष का वर्ग सिखाने को दिया । इस वर्ग में लगभग २० विद्यार्थी थे, जिनमें आज के पाश्वंगायक तलत महमूद भी थे। जिस समय मैं चतुर्थ वर्ष की परीक्षा में बैठा, उसी समय मेरे सिखाये हुए प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों की परीक्षा हुई और उनमें से चार-पाँच विद्यार्थी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए, जिनमें तलत महमूद भी थे। इस परीक्षाफल से प्रसन्न होकर गुरुजीने मुझे बालकों का चतुर्थ वर्ष का वरिष्ठ वर्ग सौंप दिया और इसी वर्ग में ‘छोटू’ भी थे । मेरे लिये यह प्रथम अवसर था, साथ साथ बड़ी जिम्मेदारी का काम था। मैंने परिश्रम कर इस चतुर्थ वर्ष का पाठ्यक्रम परीक्षा के दो माह पूर्व ही सम्पूर्ण गायकी के साथ (प्रति राग में लगभग ४-५ बंदिशों समवेत) पूर्ण कर दिया ताकि दोहराने और अभ्यास के लिए पर्याप्त समय मिल सके। एक दिन प्रत्येक विद्यार्थी को सिखाई हुई बंदिशों में से मैं पूछी हुई एक-एक बंदिश गाकर सुनाने को कहा और मैंने देखा कि ‘छोटू’ के समवेत सभी विद्यार्थियों को कोई भी एक बंदिश पूरी याद नहीं है । मैं हैरान हो गया और मुझे निराशा भी हुई। मैं बहुत क्रुद्ध हुआ, सम्भवतः अपने सांगीतिक जीवन में प्रथम बार। मैंने उसी क्रुद्ध अवस्था में सभी छात्रों को चेतांवनी दी कि यदि एक सप्ताह में सभी बंदिशें याद न हुई तो उन्हें प्रधानाचार्य (अर्थात्‌ हमारे गुरुजी) के सन्मुख खड़ा करूँगा और तब तक उन्हें सिखाऊंगा भी नहीं। मेरी इस प्रकार की नाराजगी देखकर ‘छोटू’ की आँखे भर आयीं । इसका ऐसा परिणाम हुआ कि दूसरे सप्ताह ही छोटू’ ने मेरी पूछी हुई प्रत्येक बंदिश को समाधानपूर्वक गाकर सुनाई और परीक्षा में भी उसने बहुत ही ऊँचे गुण प्राप्त किये, जिससे मेरे मन को शांति मिली। छोटू को प्रवृत्ति ‘खिलाड़ी’ की थी और वह मान बैठा था कि जब बिना परिश्रम सब कुछ मिल रहा है, तो मेहतत क्यों की जाय। किन्तु इस घटना ने उसका चिंतन ही बदल दिया, जो कुछ भी सिखाया जाता वह बड़े मनोयोग से सुनता और उसे आत्मसात करता।

इसके कुछ ही समय पश्चात्‌ मुझे गरुगृह में ही रहने का अवसर मिला, जहाँ परमपूज्य गुरुजी के अलावा ‘छोटू’, दिनकर कायकिणी, मोहनराव कल्याणपूरकरजी भी गृरुजी के साथ रहते थे।

वास्तव में गरु-सान्निध्य ही शिक्षा कीं जड़ हैं। गुरुजी हमें प्राय: कहते थे कि तुम लोग अपने कमरे में (जो उनके कमरे से लगा हुआ था) यथावकाश रियाज़ करते रहों और अगर कोई बात मुझे खटकी तो मैं तुम्हें तुरन्त सुधार सकूँ तथा तुम्हारी भूल समझा सकूँ। इस बात को सुनते ही हम लोगों ने बिना किसी विलम्ब के अपना रियाज़ शुरू किया। यह रियाज विद्यालय का समय समाप्त होने के बाद रात को ८-९ बजे शुरू होता था। कोई भी सीखा हुआ एक राग हम ले लेते थे और उसके सम्पूर्ण अंगों के साथ दो-ढ़ाई घण्टे रियाज करते थे । पास के कमरे में बैठे गुरहणीरुजी का हमारे रियाज़ पर पूरा ध्यान रहता था। जब भी गुरुजी अनुभव करते कि अब इनका ‘स्टॉक’ प्राय:समाप्त हो चुका हैतो उनमें स्फूर्ति जागृत होती और स्वयम्‌ हमारे बीच आकर नयी-नयीं कल्पनाओं के साथ हमें ‘प्रकाश’ दिखाते । फलत: हमें नयी दृष्टि मिलती, दिशा मिलती l वस्तुतः: यह दृष्टि ही हम सभी के बौद्धिक विकास में अत्यंत फलदायक रही और रहेगी । यहाँ एक और बात उल्लेखनीय हैं कि शिक्षा दी अवश्य जाती है किन्तु शिक्षा ली जाने! का भी महत्व हैं। पूज्य गुरुजी कई बार अपने कमरे में आराम कुर्सी पर बैठकर दिन भर के कार्यभार को हलका करते हुए कोई राग गुनगुनाते रहते थे। में और ‘छोटू’ चुपचाप उनका यह गुनगनाना सुनते और तुरन्त अपने कमरे में जाकर उस स्वर में तानपुरा मिलाकर तथा एक बाँया साथ लेकर चुपचाप उनके कमरे में जाकर तानपुरा छेड़ना शुरू कर देते। जब उन्हें इसका भान होता तो उन्हें आनन्द होता और आश्चर्य भी । किन्तु शिक्षा देने को उन्हें प्रेरित करने की बात इसमें निहित थी और गुरुजी भी शिष्यों की निष्ठा पर गर्व अनुभव कर प्रेम से सिखाते ।

‘छोटू’ अद्भुत प्रतिभासम्पन्न संगीतज्ञ हैं, जिसे कोई भी बंदिश एक बार सुनते ही याद हो जाती हैं। बंदिशें याद करना और उनके सही स्वस्थ स्वरूप को आत्मसात करना, उनकी प्रवत्ति का एक अंग है। बुजुर्गों का यह कथत सत्य है कि जिन्हें एक राग की अधिकाधिक चीज़ों का ज्ञान हैं, वही प्रतिभाशाली कलाकार होते हैं। आज ‘छोटू’ को जितनी बंदिशें याद हैं, हम लोगों में से शायद ही किसी को याद हों । उनका राग-ज्ञान इतना गहन हैं कि आज वे उच्चस्तर के गायक हैं। यह बात अतिशयोक्त पूर्ण नहीं है। मेरे लिये यह आनन्द की बात है। आज यदि वे स्थायीरूप से उत्तर प्रदेश में बस गये होते तो किसी विद्यापीठ के, यहाँ तक कि अपने ही भातखण्डे संगीत महाविद्यालय या विद्यापीठ में उच्चतम स्थान पर होते ।

‘छोटू’ को पूज्य गुरुजी का बहुत ही निकटतम साज्निध्य प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।, वैसा शायद ही किसी को मिला हो, क्योंकि बाल्यकाल से ही वे उन्हीं के घर लगभग १५-१६ वर्षों तक उनके साथ रहे । घर में चलनेवाली संगीत चर्चाओं का ‘छोटू’ को पूरा लाभ मिला। पूज्य गुरुजीने अपने जीवन काल में लगभग ७००-८०० बंदिशों की रचना की, जो उच्चस्तर की हैं। वे शिर्ष कवि थे, किसीनें उनसे एक आध बंदिश की फरमाइश की और तुरन्त तैयार हो जाती । उसकी प्रथम प्रति छोटू’ को ही मिलती और ‘छोटू्‌’ को ही यह देखना होता था कि वह किस ताल में बिठाने के योग्य हैं। उन बंदिशों की पाण्डुलिपि तैयार करने का भार छोटू’ को ही सौंप दिया जाता । इतना ही नहीं गुरुजी अपनी स्वरचित बंदिशों को छोटू’ के कण्ठ से सुनना-सुनवाना अधिक पसंद करते थे। इस प्रकार छोटू’ को गुरुजी की सभी बंदिशें कण्ठस्थ हुईं। पूज्य गुरुजी के सांगीतिक चिंतन का पूरा ज्ञान ‘छोटू’ के पास समग्ररूप में पहुँचा हैं। ‘छोटू’ जब गाने बैठते हैं तो मुझे ऐसा अनुभव होता हैं कि पूज्य गुरुजीही गा रहे हैं । इसका एक दृष्टांत यहाँ देना उचित होगा । उस्ताद मुष्ताक हुसैन खाँ अपनी महफिलों में प्रायः रागसागर’ गाते थे, जिससे उस समय ‘रागसागर का काफी बोलबाला हुआ था। उसी कालावधी में एक दिन गुरुजी ने रागसागर’ के अनुरूप एक काव्य की रचना की और ‘छोटू’ को देते हुए कहा कि इसकी प्रतियाँ बनाकर उसके साथ शिक्षा पाने वाले अन्य शिष्यों को दे दों और उसके समवेत सभी को आदेश दिया कि उस काव्य का

स्वरकरण चौबीस घण्टों के अन्दर मिल जाना चाहिये। ‘छोटू’ की क्षमता की यह कसौटी थी। खैर, अन्य शिष्योंने तो इस पर किसी प्रकार का प्रयत्न ही नहीं किया। ‘छोटू’ ने केवल ६-७ घण्टों में ही उस रागसागर का स्वरकरण किया तथा गुरुजी को सुनाया। गुरुजीने सुनकर इतना ही कहा कि इस स्वरकरण में ८० प्रतीशत रूपान्तर वही हैं, जो उन्होंने स्वयम्‌ सोचा था। वे बहुत प्रसन्न हुए और मनीमन अपने ‘मानसपुत्र’ को आशीर्वाद दिया। गुरु द्वारा इस प्रकार की मान्यता पाना एक बहुत बड़ी बात हैं। ‘छोटू’ मेरा शिष्य तथा लाड़ला छोटा भाई भी हैं, किन्तु इस प्रतिभा के बल पर मैं उसे अपने गुरुओं में से एक मानता हूँ ।

आज हमें उसी स्वरूप का दर्शन ‘छोटू’ के गायन एवम्‌ शिक्षण में होता हैं। मेरा और ‘छोटू’ का क्‍या नाता हैं, यह में आज भी समझ नहीं पा रहा हूँ, यह एक अदृश्य किन्तु दृढ़ आन्तरिक सृत्र हैं, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता यह अनुभूति की चीज़ है, जिससे मन प्रफुल्लित होता हैं, रोम-रोम पुलकित होता हैं। हमारे सांगीतिक जीवन में ‘छोटू’ से प्राप्त प्रेम और स्नेह अविस्मरणीय हैं। पूज्य गुरुजी की कृपा और अपार स्नेह से हममें जैसी पारस्परिक आबद्धता, एकसूत्रता है, वह अपने आप में एक उदाहरण हैं। यह प्रेम बढ़े, अपूर्ण इच्छाएँ पूर्ण हों ।

‘छोटू’ के बारे में जितना कहूँ, उतना कम हैं। यदि वे शिक्षक के चक्र में नहीं फँसते तो मालूम नहीं कहाँ पहुँचते । मेरी प्रभूचरणों में यही प्रार्थना हैं कि ‘मेरे प्यारे छोटू भाई को’ दीर्घायु, आरोग्य और संगीत की इसी प्रकार उत्कृष्ट सेवा करने की बुद्धि और क्षमता प्रदान करे। उनका जीवन गौरवमण्डित हो, यही मेरी आन्तरिक कामना हैं।

ज़ीवेम शरदः शतम्‌

Posted on Leave a comment

कुमार वयातील माझे बहिश्वर प्राण – के. जी. गिंडे

                                          कुमार गंधर्व यांनी सांगितलेल्या आठवणी

                                                                                                               शब्दांकन : रामकृष्ण बाक्रे

          १९३७ सालची गोष्ट आहे. आकाशवाणीचं चेनबुकिंग मला मित्ळू लागलं होतं. प्रथम दिल्‍ली. मग ग्वाल्हेर, मग लखनौं (आणि कधी कधी कलकत्ता देखील ) असं ते बुकिंग असे. लखनौला मी मॉरिस कॉलेजचे प्रिन्सिपॉल गुरुवर्य आण्णासाहेब रातंजनकर यांच्याकडे जायचो. तिथंच दहा एक दिवस मुक्काम असे. ३७ साली गेलों असता छोटू तब्बल चार वर्षाच्या विरहानंतर तिथं दिसला. मला कोण आनंद झाला म्हणून सांगू! बालपणीची मैत्री ही काही अपूर्वच असते समानशील मित्र हा जणू बहिश्चर प्राण वाटत असतो. छोटूला बघताच आपलं काही हरवलं होतं आणि ते गवसलं याचा तर आनंद झालाच, पण संगीतात रमू इच्छिणारा, काही ध्येय बाळगलेला छोटू योग्य ठिकाणी रुज झाला आहे याचा आनंद जास्त झाला

           [हा छोटू म्हणजे आजचे पंडित के. जी. गिंडे.  कुमार त्याच्या संदर्भातच कुमारवयातील आठवणी सांगत होते. ते पुढे म्हणाले.]

          छोटूचं घर होतं बैलहोंगल या तालुक्याच्या गावी. माझे जन्मगाव सुळेभावी असले तरी आमची शेती अमटूर या खेडयात असल्यान आम्ही अमटूरला मठात रहात असू. अमटूर आणि बैलहोंगल यांमध्ये तसं फारसं अंतर नव्हतंच. माझ्या ध्वनिमुद्रिकांची यथातथ्य नक्कल करण्याचा गुण वाढीस लावण्यासाठी माझे वडील मला वारंवार बैलहोंगलला घेऊन जायचे. आणि तिथं गेल्यावर छोटूच्या घरी गेल्याशिवाय बैलहोंगलची भेट पूर्ण होतच नसे. छोटूचं घर हे  गाण्यातलं घर होतं हे याचं मुख्य कारण ! छोटू च्या वडिलांनी त्या काळात १९११ पासून नारायणराव बालगंधर्व यांचं गाणं ऐकलेलं. ते स्वतः घरीच दर गुरुवारी भजनास बसत. ज्येष्ठ चिरंजीव रामभाऊ गिंडे ( हेच पुढे शल्यविशारद डॉ. गिंडे झाले) दिलरुबा वाजवीत. त्यांच्याहून धाकटे गोविंदराव तबला वाजवीत. आपल्या घरात कुणीतरी गायक कलावंत व्हावा असं सर्वांना वाटे. पण विशेषत: रामभाऊ गिंडे यांना. त्यांनी त्या दष्टींनं छोटूचं मन नाट्यसंगीतात गुंतवलं होतं. आमचं घर देखील गाण्यातलंच होतं. (माझी आई नाट्यगीते गायची. माझा मामा गाणारा, वडील तर गाणारे होतेच.) तेव्हा गिंडे आणि कोमकली यांचे ऋणानबंध निकटचे बनणं अपरिहार्य होतं. बैलहोंगलला त्यावेळी मोगूबाईच्या पासून ते पंडिराव नगरकरांपरय॑त सर्वांच्या ध्वनिमुद्रिका येत. पंडित नारायणराव व्यास यांच्या सर्वात अधिक. त्यां ध्वनिमुद्रिका या छोटूच्या धूळपाटया होत्या. माझे साक्षात्कार होते. [जरा थांबून कुमार पुढे सांगू लागले.]

          छोटूबाबत एक गोष्ट मला आवर्जून सांगितली पाहिजे ती ही की, अगदी प्रथम त्याला मी जेव्हा गाताना ऐकलं तेव्हा मला त्याचा हेवाच वाटला. तो चक्‍क तबल्याच्या साथीत गात होता. मला तोपर्यंत तबल्याच्या साथीत गाता येत नव्हतं. १९३१-३२ सालातील ही गोष्ट आहे. माझं वय त्यावेळी ७ वर्षाचं मानलं तर छोटू माझ्याहून दीड वर्षाने लहान म्हणज साडेपांच वर्षांचा. अर्थात्‌ त्यावेळी तो माझ्याहून इतका लहान हे मला ठाऊक नव्हतं. या षष्ठ्ब्दीच्या निमित्तान प्रथम ती कल्पना आली. छोटू हा अंगापेरानं पहिल्यापानच मजबूत. त्यामुळं तो माझ्याहून मोठा आहे असंच मला वाटायचं. छोटू्ला गायक बनवायचं हे ध्येय त्याचे ज्येष्ठ बंधू रामभाऊ यांनी मनात बाळगलेलं होतं, तर मला प्रकाशझोतात आणावं, थोर गवयानं शिष्य म्हणून पत्करावं यासाठी छोटू्चे वडील खटपटीत असत. (एकदा अशी संधी आली. मलप्रभा नदीच्या काठी गुर्लहोसुर म्हणून गाव आहें. तिथं चिदंबरम्‌ स्वामींचा उत्सव प्रतिवर्षी होई. छोटू्चे वडील त्या मठाचे विश्वस्त. त्या वर्षीच्या उत्सवात वझेबुवा सेवेला येणार हे समजताच छोटू्चे वडील मला गुर्लहोसुरला घेऊन गेले. गंमत अशी की तो मठ होता वैष्णव संप्रदायाचा आणि मी कट्टर शैव. तेव्हा माझं शैवपण लपविण्यासाठी छोटूच्या वडिलांनी मला गळ्यापर्यंत बटणं लावावयास सांगितली. वझेबुवांना मी त्यांचीच ‘बोलरे पपीहरा’ ही ध्वनिमुद्विका सहीसही ऐकविली. वझेबुवा चकित झाले, पण छोटू्च्या वडिलांच्या मनातील हेतू काही पार पडला नाही.) मी हा किस्सा एवढ्यासाठी सांगितला की, छोटूच्या वडिलांना छोटूपेक्षाही माइ्या भवितव्याची काळजी अधिक होती हे कळावे.

          मला वाटतं ३३-३४ सालापासून माझा छोटूशी संबंध तुटला. मी एका वेगळ्या वातावरणात वाढू लागलो. (३५ साली कलकत्ता आणि कानपूर इथं कीर्तीचा महापूरच माझ्यावर आला आणि ३६ सालच्या फेब्रुवारीत गुरुवर्य देवधरांकडे मी दाखल झाल्यावर गुरुवर्य आण्णासाहेब रातंजनकर एक दिवशी देवधरांकडे आले. ३६ सालच्या मे महिन्याच्या सुट्टीत ते बहुधा लखनौहून मुंबईत आले असावेत. माझी त्यांच्याकडे ये-जा सुरू झाली. तरी देखील छोटू त्यांच्याकडे येणार आहे या गोष्टीचा मला पत्ता लागला नाही. निवांत असलो म्हणजे त्याची आठवण यायची. पण त्याचं पुढे काय झालं ? त्याच्यासाठी त्याचे थोरले बंधू अण्णासाहेबांकड़े प्रयत्नशील आहेत की काय वगैरे संबंधी मला काहीही ठाऊक नव्हते. माझ्या पालक मंडळींनाही त्याबदल विचारायची सोय नव्हती. सगळे एकाहून एक जमदग्नी ! त्यामुळे छोटू १९३६ च्या मे अखेरीस अण्णासाहेबांकडे आला केव्हा आणि पुढ़े जुलैत लखनौस गेला केव्हा हे मला काहीही कळलं नाही. ३७ साली जेव्हा मीच लखनौंत गेलो तेव्हा तो चार वर्षांनंतर प्रथम दिसला आणि आमच्या स्नेहाला पुन्हा भरते आले. एक बहिश्चर प्राण पुन्हा गवसल्याचा आनंद झाला.

          देवधरांकडे आल्यावर मला आणखी एक बहिश्चर प्राण मिळाला, तो म्हणजे बंडू जोग. आजचा विख्यात व्हायोलिनिस्ट व्ही. जी. जोग तो हाच. देवधरांचा क्लास त्यावेळी बनाम हॉल लेनमध्ये होता. तिथं बंडू व्हायोलिन शिकत असे. पुढ लखनौहून अण्णासाहेबांती देवधर मास्तरांकडे मागणी केली की, मॉरिस कॉलेजला एक व्हायोलिन शिक्षक हवा आहे. तेव्हा माझा हा बहि:श्चर प्राणही लखनौला गेला. चेनबुकिंगचं निमित्त साधून लखनौं आणि ग्वाल्हेर या दोन ठिकाणी रहावयास मिळे याचं मला जास्त आकर्षण होतं. ‘नित्य नवे काहीतरी संपादावे’ हे सूत्र त्यावेळीही माइया नजरेसमोर असे. यादृष्टीने ग्वाल्हेरीस राजाभय्या पूँछवाले आणि लखनौस अण्णासाहेब ही ठेहराव ठिकाणंच होती म्हणाना त्या दोघांनाही मला भरभरून द्यावे असं वाटायचं आणि मलाही घ्यावं असं वाटायचं. गुरुवर्य अण्णासाहेबांनी त्यांच्या हस्ताक्षरात त्यांनी बांधलेल्या बंदिशी लिहून द्याव्यात आणि मी त्या कागदावरील शाई वाळावयाच्या आत मुंबई रेडिओ-केंद्रातून त्या ऐकाव्यात, असेही कित्येकदा घडलेले आहे. सालग-वराळीमधील अण्णासाहेबांची बंदीश सबंध देशाला मी अशीच मुंबई केंद्रावरून ऐकविली. त्यावेळी मुंबई केंद्र भारतभर ऐकले जायचे. कारण बहुतेक सर्व चांगले कार्यक्रम याच केंद्रावरून व्हायचे.

           लखनौ आणि ग्वाल्हेर येथे मी रमे, याची आणखीही कारणे होती. माइ्या दोन बहिश्चर प्राणांचा मी वर उल्लेख केला. आणखी तीन बहिश्चर प्राण मला मिळाले ते लखनौलाच. एस. सी. आर. भट, सदाशिव गुरव आणि दिनकर कैकिणी. दिनकर सर्वात लहान. सदाशिव हा उत्तम तबलापटू होता. माझी अनेक गाणी त्यानं वाजवली आहेत. आज तो हयात नाही याचं मला दुःख होतं आणि भट यांच्याबइल मी काय सांगू? अहर्निश अभ्यासात रमलेला, एकाच वेळी       विनीत विद्यार्थी आणि उत्तम अध्यापक या भूमिका सांभाळणारा असा मित्र मला लखनौला लाभला हे मी माझं भाग्य समजतो. भट आणि जोग दोघंही एका खोलीत राहात. मॉरिस कॉलेजच्या जवळच त्यांची खोली होती. माझा मुक्काम त्या खोलीवरच असे. संध्याकाळचा फेरफटका आटोपून आम्ही यायचों व लगेच तंबोरे काढून बसायचो. मध्यरात्र होईपर्यत आवृत्ती चाले. देवाणघेवाण होई. तिथून मग जेवण. त्यानंतर अंथरुणास पाठ टेकीत अस्‌. या कार्यक्रमात छोटू नसे. तो अण्णासाहेबांकडे असे. त्यांचा पी. ए. ही तोच. सगळे हिशेबठिशेब तोच ठेवी. पण अण्णासाहेबांचे आणि भटांचे छोटूला सतत मार्गदर्शन असे. छोटूचा दृष्टिकोण गंभीर बनायला कारणीभूत आहेत भट. अण्णासाहेबांचे गाणे कसे समजून ध्यावे याचे मार्गदर्शन करणारे भटच. |

          ग्वाल्हेर काय किवा लखनौं काय, अण्णासाहेब, राजाभय्या ही मंडळी मी लहान म्हणून माझे लाड करीत. आमचा तांडा सिनेमाला जात असे. मला भाड्यानें सायकल घेऊन देत. किती म्हणून सांगावे ! या मंडळींचा माझ्या बाबतीत परकेपणा असा नव्हताच.

          उन्हाळ्याच्या सुट्टीत अण्णासाहेब दीड महिना मुंबईस येत तेव्हा पुन्हा हे सर्व बहिःश्चर प्राण एकत्र येत. रविवारी सकाळी आणि संध्याकाळी अण्णासाहेब गायला बसत, तेव्हा भट, मी, जोग, छोटू असे सर्व असायचोच. ती संधी घालवायची नाही म्हणून मी बेळगावला जाणेही रद्द केले. यामध्ये अण्णा साहेबांकडून नकळत आमचे केवढे तरी शिक्षण होऊन जायचे. त्याशिवाय प्रत्यक्ष चर्चेतून होत असे ते वेगळेच. अण्णासाहेबांचा स्वर बारीक पण अति सुरेल. सारंगिये देखील वचकून असत. रागप्रभुत्व कमालीचे. वादवच नाही. आणि विश्लेषण इतके छान करीत की सांगून सोय नाही. उत्तम बंदिशी अशी बांधत की, पं. जगन्नाथबुवा पुरोहित यांनीही एकदा पंचम रागातील विलंबित बंदीश करून द्या अशी विनंती माझ्या करवी अण्णासाहेबांकडे केली. ‘चंद्र जाके भाल’ ही विलंबित बंदीश या विनंतीतून निर्माण झाली. त्या आधी मी “आवो गावो गावो रे’ ही द्रुत तेवढीच गात असे.

         भट आणि गिंडे या जोडीचा अभिमान मला अनेक कारणांसाठी आहे. एक तर कलेच्या क्षेत्रात जी बदमाषी चालते तिच्यापासून ते अलिप्त आहेत. शिवाय पूर्ण ज्ञानी आहेत. मला कुणी एखादा कूटप्रश्न विचारला तर मी त्या माणसाला या दोघांकडें धाडतो. समजावून देण्याचा, पटवून देण्याचा गुरुवर्य अण्णासाहेबांचा गुण यांनी सही सही उचलला आहे. गुरुशी इमान राखण्यासाठी प्रसंगी चांगली नोकरी सोड़्न द्यावी लागली तरी द्यायची हा स्वाभिमान छोटूने दाखविला आहे आणि मित्रप्रेमासाठी आपली अर्धी भाकरी मोडून प्रथम मित्राला द्यायची हे भटांनी दाखविले आहे. या दोघांनाही वललभ संगीत विद्यालय ६० आणि ६३ सालापासून लाभले हा त्या विद्यालयाचा मोठाच लाभ झाला आहे.

          छोटू मंच कलाकर होण्याच्या, एक परफॉर्मिंग आर्टिस्ट होण्याच्या ध्येयाने या कलाक्षेत्रात आला आणि एक थोर शिक्षक हे त्याचे पहिले धिरुद बनले याबदल त्याने उगाच’ खंत करू नये. परफॉर्मिंग कलाकार ठरवून होतोच असे नाही आणि तो झाला तरी त्याच्यातील शिक्षक नाहीसा होता नये. शिक्षक म्हणून मोठं होणं हेही कमी नव्हे. गिंडे, भट हे त्याअर्थाने अधिक मोठे आहेत. सहज हिशेब केला तर दोन हजार बंदिशी दोधांनाही मुखोद्गत आहेत. मला वाटतं दिनकरच्याही जवळजवळ तितक्याच. कधी एखादी बंदीश आठवली नाही तर मी सरळ त्रयीपैकी कुणाला तरी फोन करतो आणि मंच कलाकार म्हणूनही यांची योग्यता कमी नव्हे. कित्येकदा मी पाह्मलंय, भट-गिंडे ही जोडी, ही दोन डिपेल इंजिन तापली म्हणजे अप्रतिहत गतीनं आणि बुद्धिप्रभावानं मैफिलीचा संपूर्ण कब्जाच घेतात. छोटूस आता छोटू म्हणणं योग्य नव्हे. कृष्णा ही खाजगीतील हाक झाली. पण मास्या- सारख्या गेली ५० हून अधिक वर्ष मैत्री टिकलेल्याच्या मुखात डॉ. के. जी. गिंडे हे शब्द कसे यावेत ? छोटूस यापुढेही संगीत सेवेसाठी प्रदीर्ध आयुरारोग्य लाभो असंच मी म्हणणार.

Posted on Leave a comment

“CHHOTOO” AS I KNOW HIM By MOHAN NADKARNI

I think it was the summer of 1945.  The place was Belgaum. I was then a college student, as much involved in music as in my academic studies. Those were the days when I also nursed an ambition to be a vocalist and used to devote much of my leisure to listening to radio and concert music without, of course, neglecting my academic studies!

Belgaum then (as also hopefully now) abounded in public and private concerts, at which local and visiting artistes treated the local rasikas to wholsome music and sent them home with gladdened hearts.  I have haunting memories of many concerts, at which were featured stalwarts like ,Rambhau Gulavani, Vishwanathbuva Jadhav, Azmat Hussain Khan and Sureshbabu Mane, to name but a few. There also were drawing-room programmes held by well-to-do families, at which younger talent came to be given opportunities to perform before a compact but discerning group of invitees.

It was at one such private baithak that I chanced. to hear a young Marathi-speaking vocalist. He appeared then to be in his twenties, but his two-hour performance, covering well- known and less-known melodies, sounded too good for his age. What specially struck me was the natural ease and skill with which he managed to unfold and project his rare ragas. His style bore the umistakable impress of the Agra gharana, made so famous by the late maestro Faiyaz Khan, one of the all-time greats whose radio concerts I seldom missed.

I do not recollect, at this distance of time, the entire fare I heard from this youngster. But I still have the vivid memory of one melody, which was explained as Kedar-Bahar. It was the raga I had heard for the first time. I surmised that it was a combination of two time-honoured ragas delightfully familiar to my ears. But what swept me off my feet was the emergence of a new raga the hue and character of which sounded so delightfully different from that of its components. Here, indeed, was the originality and virtuosity of the composer, as also the singer, seen at their best!

Somehow, in those days I could not have the nerve to approach and get to know any performing artistes. All I did was to obtain the particulars about them through more knowledgeable friends and also local artistes.  That was how I also missed meeting this Lucknow vocalist at that programme. I was simply content to keep humming the Kedar-Bahar tune on my way home after the baithak.

I learnt  that the name of the artiste was K. G. Ginde, a senior pupil of Pandit S. N. Ratanjankar at the Marris College of Music at Lucknow. I also learnt that Ginde also belonged to Belgaum district and came from Bailhongal, and that he had come down to his native place during the summer vacation.

I also gathered that he was then only 19 and had come of a respectable cultured family and that he had decided to devote himself to music as a full-time profession. This was at a time when pursuit of music as a profession was out of bounds to even gifted youngsters, if they happened to belong to educated and cultured, families. As one who also came of such a family, my reaction to Ginde’s career  was one of both admiration and envy.

Nearly a decade ha d to go by before I came to know Ginde. That was when he left Lucknow for good, and came to this metropolis to settle down and pursue his vocation.  It took little time for our casual acquaintance to mature into lasting friendship.

Krishna Gundo Ginde was born at Bailhongal, on Saturday, December 26, 1925. He was one of the nine children of his parents. They were in all six brothers and three sisters and Krishna was the eighth child-which is Why he was named after Lord Krishna. Gundopant came of a humble family and had to go: through the mill before Ice became a medical practitioner. He set up his general practice at Bailhongal and emerged as a successful physician. He was also a keen lover of classical music and Marathi musical stage and had built up a fine” collection of recorded music of many reigning masters of the time. He also encouraged his children to share his interest in music right from their early childhood.

Gundopant’s eldest son. Ramchandra, who later rose to be one of the world-famous neurosurgeons. was the first to lead his younger brothers and sisters in the pursuit of the joyous hobby of their father. But it would seem that it was Krishna who showed his. extraordinary sensitivity to the sounds of music and rhythm even while yet an infant. Gundopant correctly sensed the child’s propensities and gave him opportunities to listen to the records. He would even encourage his child to imitate some of the masters. So much so, that Krishna gave his first private jalsa before a group of his father’s friends and relatives when he was only six years old. He sang for two and a half hours and elicited unstinted admiration from his listeners. A photograph taken on the occasion has been preserved by the Ginde family. Krishna’s brilliant debut struck the keynote of his future career and the credit for shaping it goes to his eldest doctor brother, himself a musician by choice.

Krishna, as also his other brothers, had their primary education in Kannada at Bailhongal, after which they were sent, one after another, to Belgaum for further studies at their uncle’s residence. During this time, Krishna met Shivaputra Siddharamayya Komkali, who later became famous as Kumar Gandharva

On his uncle’s transfer to Gadag, in Dharwad district. Krishna also moved with him and got himself enrolled in a secondary school where he happened to meet Bhimsen Joshi, who was also to become a musical luminary, like Kumar Gandharva, in later years. Krishna has many interesting stories of his early association and friendship with Kumar and Bhimsen-of occasions when they had opportunities to sing before maestros like Ramakrishnabuva Vaze and receive their blessings.

Meanwhile, Ramchandra Ginde continued to divide his time between his medical studies and musical pursuits. In the process, he came to Pandit Bhatkhande who helped him a great deal in learning and appreciating Hindustani music. Bhatkhandeji also gave him his textbooks so that he could learn ragas on his own during his holidays.

In time to come Ramchandra Ginde grew closer and still closer to Bhatkhandeji and it was at his suggestion that the young doctor became known to Pandit Ratanjankar, his most devoted disciple. Soon there grew a closer friendship between the two families. In response to a suggestion from Dr. Ginde, Pandit Ratanjankar, popularly known as “Annasaheb”, said that he would first like to see the boy. Accordingly, Krishna was brought to Bombay and introduced to Panditji. Krishna, who was fairly well-trained by his eldest brother, impressed his future preceptor by his talent. And he gladly agreed to teach him even during his summer stay in the city. This was in May 1936, Krishna, by his qualities of head and heart, so endeared himself to the Ratanjankar family that he was treated as one of their own. Krishna came to be nicknamed “Chhotoo” by Annasaheb, because he himself happened to be his namesake (Shrikrishna) and, for that reason, his wife could   not call the youngster by his name under the orthodox Hindu custom! The nickname has since stuck to Krishna, and he is fondly called as “Chhotoo” by all his relations, colleagues as also his vast circle of friends and admirers.

Annasaheb’s initiation of Chhotoo into classical music began with the raga  Bhairav. But he was also allowed to accompany his erudite guru in the rendering of many other ragas which he had learnt earlier from his brother. Sensing the boy’s musical potential, the guru decided to take Krishna to Lucknow with the permission of his elders.

The years of Chhotoo’s grooming at Lucknow truly laid the foundations of his future career. The boy was too young to realise that the Marris College was a residential institution, that Annasaheb was its Principal  and  that it  had a staff of several teachers like Shri G. N. Natu, Balaji Pathak and others. It was here that he met S. C. R. Bhat, a senior student, and Dinkar Kaikini who joined the college a little later.

Chhotoo’s stay at Lucknow for a decade and a half was marked by intensive grooming in the art and science of Hindustani music. During this period, he benefited from the guidance of not only Annasaheb but also his other colleagues and senior disciples like Bhat. In time to come, he acquired a sound command of technique and excellence in the presentation of dhrupad, dhamar, Khayal, tappa and thumri. He won the college distinction of “sangeet nipun”, bagging a gold medal for his proficiency.

What is more, Chhotoo benefited immensely from his association, in one way or other, with several  stalwarts  like  Rajabhayya  Poochhwale, who kept visiting the college almost round the year. Such visits were always marked by baithaks in the college premises and also enlightening discussions on various topics concerning the classical tradition. Precocious Chhotoo made the best of such rare   opportunities of exposure to the wider world of music. These, coupled with his traditional grooming amid an utterly homely environment, shaped his personality and character.

Even in the midst of his round-the-clock schedule of musical grooming. Chhotoo managed to pursue his academic studies.  He passed his matriculation examination in 1942, side by side with his Sangeet Visharad examination. It was a measure of Annasaheb’s confidence that he entrusted to him even the responsibilities of looking after the accounts matters. It would be no exaggeration to say that Chhotoo was always with Annasaheb like his shadow, ready and willing to do anything at his guru’s bidding. With his prodigious memory. he set a record of memorising a whopping figure of over 2,000 chijas from the vast repertory of Bhatkhandeji’s and Annasaheb’s monumental works. Little wonder that the guru was justly proud of his shishya!

During the last few years of his stay at Lucknow, Chhotoo served on the   teaching   staff of his college and also became a popular broadcaster. But, in obedience to his guru’s wishes, he moved to Bombay and joined the teaching staff of the Bhavan’s college of music in 1951. Already, his senior colleagues, the late Chindanand Nagarkar and Bhat, were there to manage the affairs of the newly-started institution.  He served the college for five years.

In 1962, Chhotoo and Bhat were invited by the erudite scholar-musician, Swami Vallabhdasji to take over the responsibilities of his newly founded Sangeetalaya at Sion, in Eastern Bombay. Since then both have become synonymous with the institution. In the intervening years, the gurubhais engaged themselves in giving private tuitions, Chhotoo also worked with the Rev. Fr. Proksh to score the music for his Biblical numbers and visited Germany with the dignitary. While there, he earned appreciation and recognition from the Pope who presented him with a medal.

A regular broadcaster and telecaster, Chhotoo has participated in almost all major musicaI events in India. As a performing artiste, he has won accolades from leading cultural institutions. He is connected with several universities all over the country in various capacities and has also conducted music workshops and lecture-cum-demonstrations, besides participating in important seminars and symposia. More recently, he has taken the lead in the establishment of a registered charitable trust in memory of his great guru with the object of preserving and perpetuating his missionary work.

And who does not know the uniqueness of his partnership with Bhat on the musical stage? The duo has few peers in this difficult art. Their partnership in stage performance is but one aspect of their exemplary spirit of comradeship in whatever they undertake. And vidya daan is, above all, their life’s mission.

In reply to a question, chhotto once candidly said that it was not his intention to be a teacher. But he honestly wanted to preserve the music he was taught and be a performing musician. It was his devotion to his guru that inspired him to take to teaching. And, to the manner born, he has emerged as an ideal acharya in his own right, who remains immersed in the holiness of his mission, following in the footsteps of his illustrious guru. Happily married with two sons, who are already well settled in life, Chhotoo endears himself even to strangers as much by his affability as by his spartan simplicity. He carries his scholarship and eminence lightly. A man of clean habits (pan-chewing is his only weakness, if it can be so called), he keeps himself aloof from petty jealousies and rivalries that beset his profession. But this big-sized chhotto is an interesting raconteur, humorous and sunny by disposition. Meeting him any time is always a happy experience. And I am one of those who proudly cherish his friendship and goodwill for me.