अप्रचलित राग और ताल (Aprachalit Raag Aur Taal)

By कृष्ण नारायण तेलंग (Krushn Narayan Telang)

$13.66

Description

संगीत गायन कला के सम्बन्ध में जिस बन्दिश को सीखना, गाना और फिर भलीभाँति निभाना थोड़ा कठिन हो, उसे “अप्रचलित’” माना जाता है। इस कारण से ये प्रचार में कम आ पाती हैं। फिर भी चाहे अप्रचलित ‘राग’ हों या ‘ताल”, इस तरह की निबद्ध बन्दिशों का महत्त्व कम नहीं होता, बल्कि सामान्य बन्दिश की तुलना में इन्हें कलात्मकता के दृष्टिकोण से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण ग्वालियर घराने में भी अप्रचलित रागों एवं तालों में निबद्ध अनेक
बन्दिशों को गुरूओं द्वारा रचा और सिखाया जाता रहा है। पुराने समय से ही ग्वालियर में धृपद-धमार गायन की समृद्ध परम्परा रही है। ग्वालियर घराने की गायकी में ताल अंग का प्रभाव प्रमुखता से दिखता है। ग्वालियर घराने की गायकी में, प्रारम्भ में आलाप द्वारा राग का विस्तार, फिर मध्यलय में बन्दिश का गायन, तीन सप्तकों में सीधी सपाट तानें लेना, बोल बहलावे के साथ-साथ बन्दिश का विस्तार करते हुए लयकारी के प्रयोग करना ये महत्त्वपूर्ण तत्व हैं। इसके साथ ही कुछ खास बातें भी दिखती हैं। ग्वालियर घराने में गायकी को चमत्कारपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने का भी विशेष प्रयत्न किया जाता है। ग्वालियर घराने के गायक पुराने समय में अपनी प्रस्तुति को एक प्रतिस्पर्धा में भाग लेने की तरह मानते थे। ग्वालियर घराने के गायक, अपने से पहले गाने वाले गायक से ज्यादा प्रभावशाली प्रस्तुति के लिये अप्रचलित राग अथवा ताल की बंदिशों में गायन प्रस्तुति प्रारम्भ करते थे। इसी प्रकार अपने साथी संगतकार तबला वादक की योग्यता की परीक्षा लेने के लिये कभी कभी अप्रचलित ताल की बन्दिशों में गायन भी करते थे।

आज गुरु-शिष्य परम्परा लगभग लुप्तप्राय हो रही है। अत: प्राचीन संगीत की रचनाओं को स्वर-लिपिबद्ध कर सुरक्षित रखना एकमात्र उपाय शेष रह गया है। इस उद्देश्य को अपना कर्तव्य मानकर लेखकने संगीत रचनाओं को स्वर-लिपिबद्ध करने का कार्य किया।

Additional information

Weight 370 oz
Language

Hindi