प्रथमा विशारद : भाग १ आणि २ (Prathama Visharad : PraveshikaBhag 1 Ani 2)

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Description

प्रथमा-विशारद’ पुस्तक का निर्माण किया ताकि विद्यार्थ को अलग-अलग रागों की विविध प्रकार की बंदिशें तथा उपशास्त्रीय आदि प्रकार ढूंढने में कठिनाई न हो। सभीने इस उपक्रम के लिए हमें सराहा। विविध तालों में अनेक बंदिशें देने का (जैसे सरगमगीत, प्रयास किया है। विद्यार्थि अपनी पसंद से उनमें से जितनी चाहें सीख ले। साथ ही अनेक ख्यालों में आलाप-तानें देने का भी प्रयास किया है।

सभी दिशाओं में (गायन, वादन, नर्तन) संगीत के विद्यार्थि का विकास होना जरुरी है। गायन के साथ-साथ वह तबले के बोल भी जाने, नृत्य का भी अंश उसे मालूम हो, इस तरह उसका सर्वागीण विकास होना उसके लिए लाभदायक होगा। सिर्फ़ संगीत परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना यह विद्यार्थि का मकसद नहीं होना चाहिए। आगे चलकर विद्यार्थि से कला का उत्स्फूर्त प्रक्रीकरण भी होना जरुरी है। अपने आप पर विश्वास और कड़ा रियाज ही सफ़लता की सीढ़ी बनती है। कला को अपने अंतर्मन में शरण दीजिए। : गुरु-शिष्य परंपरा से तालीम पाना महत्त्वपूर्ण है। शिक्षकों से शिष्य जितना सीख सकता है, सीख ले। आगे जाकर उसी के बलबूते पर उसे कला का निर्माण एवं विस्तार करना है। संगीत परंपरा के अनेक प्रतिभावान गायक-गायिकाओं की जीवनी अभ्यासक्रम में है। हमें उनके परिश्रम पर भी ध्यान देना होगा। एक महत्त्वपूर्ण बात है, शिक्षा और कला दोनों अलग बातें है। शिक्षा सभी पा सकते है, किंतु उनमें से कलाकार गिनेचुने ही बनते है। हमें हमारा लक्ष्य उँचे दर्जे का ही रखना है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संगीत शिक्षाप्राप्त व्यक्ती, कलाकार एवं रसिक- तीनों अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ ही है।

Additional information

Weight 395 oz
Language

Hindi